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राजा बख्तावर सिंह राठौर: वीरता की अनकही कहानी जो अंग्रेजों को भी डराती थी

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वीरों की भूमि का एक महान योद्धा

भारत हमेशा से वीरता का प्रतीक रहा है, जहाँ कई महान व्यक्तित्वों ने जन्म लिया। इनमें से एक प्रमुख नाम राजा बख्तावर सिंह राठौर का है, जिनकी वीरता से अंग्रेज भी भयभीत थे। बख्तावर सिंह की ताकत और साहस ने न केवल अंग्रेजों को, बल्कि उनके साम्राज्य को भी हिला कर रख दिया। अंग्रेजों ने उन्हें समाप्त करने के लिए अपने सभी नियमों को ताक पर रख दिया और दो बार फांसी पर लटकाया, लेकिन उनकी वीरता का नाम आज भी इतिहास में अमिट है.


बख्तावर सिंह का प्रारंभिक जीवन

राजा बख्तावर सिंह का जन्म 14 दिसंबर 1824 को मध्य प्रदेश के धार जिले के अमझेरा कस्बे में हुआ। वे महाराजा अजीत सिंह और महारानी इंद्रकुंवर के पुत्र थे। मात्र सात वर्ष की आयु में उन्हें रियासत की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी, लेकिन उनकी वीरता और साहस ने उन्हें जल्दी ही एक महान योद्धा बना दिया।


1857 का स्वतंत्रता संग्राम और बख्तावर सिंह

1857 का स्वतंत्रता संग्राम पूरे देश में गूंज रहा था, और मध्य प्रदेश का मालवा क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं था। राजा बख्तावर सिंह ने इस संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अंग्रेजों को मालवा के 200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में कई बार पराजित किया। महू, आगर, नीमच, महिदपुर, मंडलेश्वर और अन्य सैन्य छावनियों को ध्वस्त कर उन्होंने अंग्रेजों को गुजरात और मालवा क्षेत्र से खदेड़ दिया।


अंग्रेजों से मुकाबला और बख्तावर सिंह की वीरता

3 जुलाई 1857 को, बख्तावर सिंह ने अपनी सेना के साथ भोपावर छावनी पर हमला किया। इस हमले में अंग्रेज सैनिक बिना लड़े ही भाग गए और बख्तावर सिंह ने शस्त्रागार और कोषागार पर कब्जा कर लिया। इसके बाद उन्होंने सरदारपुर और मानपुर-गुजरी की छावनियों पर भी हमला किया, जहाँ सैकड़ों अंग्रेज सैनिक मारे गए।


गिरफ्तारी और फांसी की कहानी

5 दिसंबर 1857 को, अंग्रेजों ने अमझेरा के किले पर हमला करने की योजना बनाई और धोखे से बख्तावर सिंह को गिरफ्तार कर लिया। फरवरी 1858 में उन्हें फांसी देने की तैयारी की गई। पहले प्रयास में, उनकी भारी कदकाठी के कारण रस्सी टूट गई, लेकिन अंग्रेजों ने नियमों की अवहेलना करते हुए उन्हें दोबारा फांसी पर लटका दिया।


राजा बख्तावर सिंह की विरासत

राजा बख्तावर सिंह की वीरता और संघर्ष भारतीय इतिहास में सदैव याद रखी जाएगी। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते हुए बिताई। उनके साहस और पराक्रम को आज भी लोग श्रद्धा और सम्मान के साथ याद करते हैं।


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