राष्ट्रप्रेम के जज्बे से लबरेज दिग्गज एक्टर मनोज कुमार पंचतत्व में विलीन हो गए। उन्हें राष्ट्रीय ध्वज में लपेटकर राजकीय सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई। शुक्रवार को 4 अप्रैल को एक्टर ने 87 की उम्र में मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में अंतिम सांस ली। आज 5 अप्रैल शनिवार को 'भारत कुमार' का अंतिम संस्कार दोपहर 12 बजे विलेपार्ले श्मशान भूमि पर किया गया। उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए उनके परिवार और रिश्तेदार के अलावा भारी संख्या में फिल्मी सितारे और फैन्स भी आसपास मौजूद थे।पवन हंस में अंतिम संस्कार से पहले एक्टर के घर पर तैयारियां शुरू थी। मनोज कुमार के निधन के बाद से उनके लिए हर कोई भावुक और मायूस दिखा और नम आंखों से उन्हें विदाई दी। उन्हें आखिरी विदाई पर श्रद्धांजलि देने के लिए अमिताभ बच्चन से लेकर अभिषेक, सलीम खान, अरबाज खान, प्रेम चोपड़ा जैसे तमाम सिलेब्रिटीज पहुंचे। शुक्रवार को हुआ निधन, शनिवार को अंतिम संस्कार यहां बता दें कि शुक्रवार को उनके निधन के बाद शनिवार को अंतिम संस्कार का फैसला लिया गया। दरअसल उनकी फैमिली के कुछ सदस्य विदेश में थे इसलिए उनका अंतिम संस्कार आज किया गया। धर्मेन्द्र से लेकर हेमा मालिनी, सलमान खान, शाहरुख खान, अक्षय कुमार, कंगना रनौत जैसी तमाम सिलेब्रिटीज़ ने एक्टर के निधन पर दुख जताया और उन्हें याद किया। मनोज कुमार 21 फरवरी से कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती थेबताया जाता है कि मनोज कुमार 21 फरवरी से कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती थे। एक्टर उम्र को लेकर सांस और हार्ट की बीमारी से जूझ रहे थे। वहीं अस्पताल ने भी एक ऑफिशियल स्टेटमेंट जारी कर बताया था कि मनोज कुमार के पार्थिव शरीर को अस्पताल में ही रखा गया था। अंतिम संस्कार की जानकारी देते हुए उनके बेटे कुणाल ने मीडिया को बताया था, 'हम 9 बजे अस्पताल से निकलेंगे और 10 बजे अपने घर आएंगे। 11 बजे हम अंतिम संस्कार के लिए पवन हंस जाएंगे।'
देशभक्ति पर आधारित 'शहीद' और 'उपकार' जैसी फिल्मेंएक एक्टर और फिल्मकार के रूप में उन्होंने देशभक्ति की भावना को रूपहले पर्दे पर उन्होंने उस समय उतारा जब आजादी के बाद का उदीयमान भारत अपने सपनों और संभावनाओं को साकार कर रहा था। मनोज कुमार ने साल 1960 और 1970 के दशक के दौरान 'उपकार', 'पूरब और पश्चिम' और 'रोटी, कपड़ा और मकान' जैसी फिल्मों के जरिए उभरते भारत की कहानियों को बड़े पर्दे पर शानदार तरीके से बयां किया। इन सभी फिल्मों को दर्शकों का खूब प्यार मिला। देशभक्ति पर आधारित 'शहीद' और 'उपकार' जैसी लोकप्रिय फिल्मों में अभिनय के बाद वह 'भारत कुमार' के नाम से मशहूर हुए।
दर्शकों के दिलों में जगह बनाईदेशभक्ति पर आधारित फिल्मों के जरिए दर्शकों के दिलों में जगह बनाने वाले मनोज कुमार ने फिल्म 'हिमालय की गोद में', 'दो बदन' और 'पत्थर के सनम' जैसी फिल्मों के रोमांटिक नायक के रूप में भी अपना लोहा मनवाया। मनोज कुमार को पहली सफलता 1962 में फिल्म 'हरियाली और रास्ता' से मिली, जिसमें वह माला सिन्हा के साथ नजर आए।
आज भी दर्शकों को झकझोर देती हैं उनकी फिल्मेंमनोज कुमार की फिल्मों की तरह उनके गीत भी बेहद लोकप्रिय हुए। इन गीतों में 'तौबा ये मतवाली चाल', 'महबूब मेरे, महबूब मेरे ..’, 'चांद सी महबूबा हो मेरी', 'एक प्यार का नगमा है' और 'पत्थर के सनम' आदि गीतों की एक लंबी लिस्ट है। हालांकि मनोज कुमार की विरासत हमेशा उनके दौर की देशभक्तिपूर्ण फिल्मों से ही जुड़ी रहेगी। उनकी कुछ फिल्में, जिनमें 'पूरब और पश्चिम' भी शामिल है, आज भी दर्शकों को झकझोर देती हैं। फिल्म 'उपकार' से निर्देशन की शुरुआत कीकुमार ने 1967 में फिल्म 'उपकार' से निर्देशन की शुरुआत की, जिसमें उन्होंने मुख्य भूमिका भी निभाई। यह तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के लोकप्रिय नारे 'जय जवान, जय किसान' से प्रेरित थी। फिल्म के जरिए ग्रामीण बनाम शहरी जीवन को पेश किया गया, जिसका नायक एक किसान है और वह अपने देश के लिए सैनिक बन जाता है। फिल्म ‘उपकार’ से दो साल पहले ‘शहीद’ आईकुमार को इस फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया। 'उपकार' में प्राण ने दयालु और बुद्धिमान मलंग चाचा की भूमिका निभा अपनी क्रूर खलनायक की छवि को पीछे छोड़ दिया। यह फिल्म प्राण के करियर में भी महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। फिल्म ‘उपकार’ से दो साल पहले ‘शहीद’ आई थी, जो स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह के जीवन पर आधारित थी जिसमें कुमार ने मुख्य भूमिका निभाई थी। मनोज कुमार का असली नाम हरिकृष्ण गिरि गोस्वामी थामनोज कुमार की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक ‘रोटी कपड़ा और मकान’ (1974) है, जिसके वह निर्माता-निर्देशक थे और उन्होंने इस फिल्म में एक्टिंग भी की थी। मनोज कुमार का असली नाम हरिकृष्ण गिरि गोस्वामी था। उनका जन्म वर्ष 1937 में अविभाजित भारत के एबटाबाद शहर (अब पाकिस्तान) में हुआ था। वर्ष 1947 में विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान में अपना सबकुछ छोड़कर दिल्ली आ गया। वो बहुत ही मुश्किल समय था। उन्होंने अपने दो महीने के भाई को खो दिया, क्योंकि शहर में भड़के दंगों के कारण उसकी अस्पताल में देखभाल नहीं की जा सकी। 'कभी अभिनेता बनूंगा तो अपना नाम मनोज कुमार ही रखूंगा'कुमार ने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की, जहां उन्होंने थियेटर की गतिविधियों में सक्रिय तौर पर भाग लिया। अपने अच्छे चेहरे-मोहरे के लिए मशहूर एक्टर ने इसके बाद हिंदी सिनेमा में पहचान बनाने के लिए मुंबई का रुख किया। कुमार ने 2021 में 'पीटीआई-भाषा' को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, 'मुझे वह समय याद है जब मैं 1949 में रिलीज हुई शबनम में दिलीप कुमार साहब को देखने गया था। उनकी वजह से ही मैं सिनेमा का फैन बना। मुझे फिल्म में उनके निभाये किरदार से प्यार हो गया जिसका नाम मनोज था... मैंने तुरंत फैसला किया कि अगर मैं कभी अभिनेता बनूंगा तो अपना नाम मनोज कुमार ही रखूंगा।'



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