राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, दादा साहेब फाल्के पुरस्कार और भारत सरकार की ओर से सिनेमा में उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित दिग्गज एक्टर मनोज कुमार का शुक्रवार को 87 साल की उम्र में निधन हो गया। देशभक्ति फिल्मों में काम करने के कारण वह फैंस के बीच 'भारत कुमार' के नाम से भी मशहूर थे। उनके निधन पर बॉलीवुड समेत तमाम क्षेत्र के दिग्गजों ने शोक व्यक्त किया है।देशभक्ति से ओतप्रोत फिल्मों की बात हो, तो उसके पूरक के रूप में उन्हीं का नाम आता है। उन्होंने भारतीय सिनेमा के सौ साल में और आजादी की 78 वीं सालगिरह तक इंडियन सिनेमा को देश प्रेम में डूबी 'शहीद', 'उपकार', 'पूरब और पश्चिम', 'रोटी कपड़ा और मकान' व 'क्रांति' जैसी कई क्लासिक फिल्में दीं। मनोज कुमार वह कलाकार थे, जो आजादी से पहले बंटवारे की आग में झुलसे और स्वंतत्रता व ब्लैक एंड वाइट सिनेमा से रंगीन चलचित्र के बदलते दौर के साक्षी रहे। वह अपने पीछे पत्नी शशि गोस्वामी और बेटे कुणाल गोस्वामी को छोड़ गए। भारत का रहने वाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं....अपने इस गाने से लोगों का दिल जीतने वाले मनोज कुमार से हमारी कई मुलाकातें रहीं। उन मुलाकातों में उन्होंने हमसे कई बातें साझा की थीं। चार साल तक रिफ्यूजी कैंप में रहेमनोज कुमार का जन्म 24 जुलाई 1937 को ऐबटाबाद में हुआ जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान का हिस्सा बना। बंटवारे की त्रासदी के बाद वे उनका परिवार दिल्ली आ गया था। उन्हीं के शब्दों में, 'मैं उस वक्त दस साल का रहा होऊंगा, जब मैंने लाहौर में खून का दरिया देखा। हम घर से बेघर हुए। हमारे खानदान के 60 लोगों को कत्ल कर दिया गया। हमारा सब कुछ बर्बाद हो गया था। बंटवारे का दंश ऐसा है, जिसने दोनों पक्षों को डसा है। हम कांपते-कांपते हुए दिल्ली आए थे। पूरे चार साल तक हम दिल्ली के रिफ्यूजी कैंप में रहे थे। दिल्ली में ही मेरी पढ़ाई-लिखाई हुई। वहीं के हिंदू कॉलेज से मैंने ग्रेजुएशन किया।'
पहली कमाई थी 11 रुपएवह दिलीप कुमार और अशोक कुमार की फिल्मों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने एक्टर बनने का फैसला कर लिया। महज 19 साल की उम्र में फिल्मों में काम करने के लिए वह मुंबई आए। मगर उनकी शुरुआत फिल्म लेखन से हुई। बकौल मनोज कुमार, 'मेरे फ़ूफीजात भाई लेखराज भाकरी निर्देशक थे। उन्होंने मुझे देखकर कहा था, तू हीरो लगता है। मेरे संघर्ष के दिन थे। मैं रणजीत स्टूडियो में राइटिंग का काम करता था। उस वक्त मुझे एक सीन के 11 रुपये मिलते थे। हफ्ते में मुझे 5-6 सीन लिखने को मिल जाते और 60-70 रुपए का जुगाड़ हो जाता था। उन दिनों मैं धर्मेंद्र और निर्देशक सोहनलाल कंवर मलाई, सिगरेट और मोसंबी के जूस के खूब मजे से उड़ाया करते थे। दादर से शिवाजी पार्क जाने के ढाई रुपये टैक्सी के लगते थे।''एक दिन मुझे पता चला कि निर्देशक रमेश सहगल परेशान घूम रहे हैं। उन्हें एक्टर अशोक कुमार की डेट्स तो मिल गईं, मगर उन्हें सीन पसंद नहीं आ रहे थे। मैंने जब लिखने की पेशकश की, तो पहले तो उन्होंने हंसी में उड़ा दिया, मगर बाद में उन्हें मजबूरी में मुझसे लिखने को कहना पड़ा। अशोक कुमार को मेरा लिखा हुआ वह सीन इतना ज्यादा पसंद आया कि उन्होंने मुझे शगुन के रूप में 11 रुपए दिए थे। मैंने उनके पैर छुए और मैं बहुत फेमस हो गया था तब। मेरे जिस कजिन भाई लेखराज भाकरी ने मुझसे कहा था कि मैं हीरो मैटिरियल हूं, उसी ने 1957 में आई अपनी फिल्म 'फैशन' में मुझे अस्सी साल के बूढ़े भिखारी का रोल दिया। (हंसते हैं) साल 1960 में मुझे हीरो के रूप में 'कांच की गुड़िया' में मौका मिला और ढाई हजार रुपए मेहनताना। फिर 7 हजार 'पिया मिलन की आस', 11 हजार 'रेशमी रुमाल' और इतनी ही फीस 'हरियाली और रास्ता' के लिए मिली थी। अब तो मैंने सुना है कि कलाकार करोड़ों रुपए एक फिल्म के लेते हैं।' मनोज कुमार ने 'वो कौन थी', 'भगत सिंह', 'गुमनाम', 'पत्थर के सनम', 'नील कमल' और 'पूनम की रात' जैसी कई हिट फिल्मों में काम किया।
शहीद भगत सिंह की मां बोलीं, दिखता तो मेरे बेटे जैसा ही हैशहीद भगत सिंह जैसी फिल्म के लिए ख्याति बटोरने वाले मनोज कुमार ने बताया था, 'जब मैं 'शहीद' बना रहा था, तो उस दौरान मैं भगत सिंह के परिवार से मिलने गया। मुझे पता चला कि उनकी माता विद्यावती जी अस्पताल में भर्ती हैं। भगत सिंह के भाई कुलतार सिंह ने मुझे बताया गया कि वह दवाई नहीं खा रही हैं। मैं उनसे मिला, मैंने उनके पांव छुए, जब डॉक्टर ने कहा कि मैं उनके बेटे भगत सिंह जैसा लगता हूं, तो मुझे देखकर वे बोलीं, 'हां, लगता है, वैसा' उन्होंने मेरे हाथ से दवा खाई। मैं उस वक्त बहुत जज्बाती हो गया था। शहीद को 3 नेशनल अवॉर्ड मिले थे और अवॉर्ड समारोह में मैं विद्यावती जी को अपने साथ ले गया था। वहां प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी ने सम्मान में उनके पैर छुए। सभी ने शहीद और विद्यावती जी को स्टैंडिंग ओवेशन दिया था। वह मेरे हिसाब से एक शहीद की मां के लिए गर्व भरा पल रहा होगा। 1965 के इंडिया-पाकिस्तान के युद्ध के बाद मैं प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी से भी मिला और उन्हीं के 'जय जवान जय किसान' नारे से प्रेरित होकर मैंने 'उपकार' बनाई थी।' कई पुरस्कारों से नवाजे गए मनोज कुमार ये बताना नहीं भूले, ' मैंने कभी पैसों के लालच में काम नहीं किया। फिल्म 'शोर' के दौरान मेरे चाचाजी एक ब्लेड के विज्ञापन का प्रस्ताव लेकर आए थे और वो लोग उस ब्लेड को भारत ब्लेड के नाम से बाजार में लाने को तैयार थे। तब तक मैं 'भारत कुमार' के नाम से लोकप्रिय हो चुका था। वे लोग मुझे बहुत मोटी रकम देने को तैयार थे। मगर मैंने कहा कि मैं यहां ब्लेड बेचने नहीं आया।' देशभक्ति थोपी हुई नहीं होनी चाहिए देशभक्ति के पर्याय के रूप में जाने जाने वाले मनोज कुमार के देश प्रेम को लेकर बहुत ही अलहदा विचार थे। उनका कहना था, 'मुझे लगता है कि देशभक्ति की लहर बहुत ही अच्छी बात है, मगर यह थोपी हुई नहीं जानी चाहिए। आप अगर देशभक्ति की फिल्म बनाते हैं तो बनाएं और अगर आप उसमें अपना कोई विचार या दृष्टिकोण रखना चाहते हैं, तो बेशक रखें, मगर वह मुबई से लेकर मेक्सिको तक को प्रभावित करने वाला हो।'
मैंने आजादी की कीमत चुकाई हैभारत कुमार के नाम से जाने जाने वाले मनोज कुमार से जब हमने पूछा कि क्या बंटवारे की त्रासदी ने ही उन्हें देशभक्ति के रास में डूबी हुई फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया, तो उनका कहना था, 'मैंने आजादी की कीमत चुकाई है। मैंने आजादी को जिया है। मुझे याद है विभाजन से पहले जब हम स्कूल में थे, तभी से बच्चों के जुलूस में भाग लेते और जोर-जोर से नारे लगाते, 'लाल किले से आई आवाज, सहगल ढिल्लन, शाहनवाज' हिंदुस्तानी इतिहास में ‘लाल किला ट्रायल’ के नाम से प्रसिद्ध आजाद हिंद फौज के इस ऐतिहासिक मुकदमे के दौरान उठे नारे ‘लाल किले से आई आवाज-सहगल, ढिल्लन, शाहनवाज़’ ने उस समय मुल्क की आजादी के हक के लिए लड़ रहे लाखों नौजवानों को एक सूत्र में बांध दिया था।वकील भूलाभाई देसाई इस मुकदमे के दौरान जब लाल किले में बहस करते, तो सड़कों पर हजारों नौजवान नारे लगा रहे होते। पूरे देश में देशभक्ति का एक ज्वार सा उठता, तो मैंने अपने बचपन में आजादी को पाने का वो जुनून भी देखा है। विभाजन के बाद दिल्ली के रिफ्यूजी कैंप में भी मेरे वालिद साहब लगातार देश और मुद्दों के लिए काम करते रहे। मेरे आदर्श वही थे। मेरे बाप का सब कुछ लुट गया था, मगर उन्होंने अपना नेशनल कैरेक्टर कभी नहीं छोड़ा। मैं गर्व से कह सकता हूं कि देशभक्ति मेरी रगों में है और इसी कारण मैं उस तरह का सिनेमा बना पाया।'

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